Nobel Peace Prize 2026: दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के परिवार में जन्मीं न्यायविद नवी पिल्लई को वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने 9 अक्टूबर को उनके नाम की घोषणा की। उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और युद्ध अपराधों के दोषियों को न्याय के कटघरे तक पहुंचाने में योगदान के लिए यह सम्मान मिला है। लेकिन नवी पिल्लई का सफर केवल एक प्रतिष्ठित पुरस्कार तक सीमित नहीं है। उनके परिवार ने गरीबी और रंगभेद का सामना किया, जबकि उन्होंने कानून को भेदभाव के खिलाफ लड़ाई का माध्यम बनाया। परिवार ने झेली गरीबी नवी पिल्लई का जन्म 1941 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उनके दादा-दादी भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे। उनके दादा को गिरमिटिया मजदूर के रूप में गन्ने के खेतों में काम करना पड़ा। एक हादसे में उन्होंने अपने दोनों हाथ गंवा दिए, जिससे परिवार की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गईं। परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उनके पिता को महज आठ साल की उम्र में पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ा। बाद में उन्होंने बस चालक के रूप में काम किया। उनकी मां को भी सामाजिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा हासिल करने का अवसर नहीं मिला। ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं पिल्लई ने शिक्षा हासिल की और कानून के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। रंगभेद के खिलाफ लड़ाई नवी पिल्लई ने 1967 में अपनी कानूनी फर्म शुरू की। रंगभेद के दौर में उन्होंने उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं का बचाव किया, जिन्हें नस्लीय भेदभाव का विरोध करने के कारण गिरफ्तार किया गया था। 1973 में उन्होंने रॉबिन आइलैंड की जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों तक पहुंच का अधिकार दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। इन कैदियों में नेल्सन मंडेला भी शामिल थे। हालांकि, पिल्लई ने स्पष्ट किया था कि जेल में वकील के रूप में जाने के बावजूद उनकी मंडेला से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी। महिलाओं के अधिकारों के लिए भी उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। वर्ष 1992 में वह अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन ‘इक्वैलिटी नाउ’ की सह-संस्थापकों में शामिल रहीं। रवांडा नरसंहार मामले में ऐतिहासिक भूमिका 1995 में पिल्लई को रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 1999 से 2003 तक उन्होंने इस न्यायाधिकरण की अध्यक्षता भी की। जीन-पॉल अकायेसु मामले में उनकी भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। इस मुकदमे में अदालत ने पहली बार माना कि बलात्कार और यौन हिंसा, परिस्थितियों के आधार पर, नरसंहार के अपराध का हिस्सा हो सकते हैं। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय कानून में एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की और संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण रास्ता खोला। संयुक्त राष्ट्र में भी निभाई अहम जिम्मेदारी पिल्लई ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और दक्षिण अफ्रीका की न्यायिक व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 2008 से 2014 तक वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं। इस दौरान उन्होंने मानवाधिकारों, समानता और जवाबदेही के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। क्यों मिला 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार? नॉर्वेजियन नोबेल समिति के अनुसार, पिल्लई ने युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार के मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनका करियर इस बात का उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और न्यायिक संस्थाएं हिंसा रोकने तथा शांति की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। गिरमिटिया मजदूर परिवार की कठिन परिस्थितियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय के क्षेत्र में शीर्ष मुकाम तक पहुंचने वाली नवी पिल्लई की कहानी संघर्ष, दृढ़ता और मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता की मिसाल है। 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार उनके इसी लंबे योगदान को वैश्विक पहचान देता है। ये भी पढ़ें: यूपी राज्यसभा चुनाव: सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित, BJP-सपा ने बांटी सीटें!