DELHI NEWS : भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में जिस मोड़ पर पहुंचे थे, वहां से अब धीरे-धीरे बातचीत की मेज तक लौट रहे हैं। राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। BRICS समिट के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय बातचीत भी होगी। ऐसे समय में बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों देश वास्तव में पुराने मतभेद पीछे छोड़कर साथ आने की तैयारी कर रहे हैं या फिर यह सिर्फ बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच तनाव कम करने की रणनीति है। गलवान के बाद दोनों देशों के रिश्ते बेहद खराब दौर में चले गए थे। सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ी, बातचीत के कई दौर हुए और भरोसे की खाई गहरी होती गई। अक्टूबर 2024 में सीमा पर डिसइंगेजमेंट के बाद रिश्तों में कुछ नरमी दिखाई दी। इसके बाद मोदी और जिनपिंग की मुलाकातों का सिलसिला भी आगे बढ़ा। अब जिनपिंग का दिल्ली आना इसी प्रक्रिया की अगली बड़ी कड़ी माना जा रहा है। कारोबारी जरूरतों ने बातचीत की राह खोली भारत और चीन के बीच तनाव के बावजूद दोनों देशों की आर्थिक निर्भरता को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर, बैटरी, टेलीकॉम, मशीनरी और कई दूसरी इंडस्ट्रीज चीनी कंपोनेंट्स और कच्चे माल पर निर्भर हैं। दूसरी तरफ भारत चीन को बड़े पैमाने पर कच्चा माल और कुछ दूसरे उत्पाद निर्यात करता है। यही वजह है कि दोनों देश राजनीतिक मतभेदों के बीच आर्थिक रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसे अभी स्ट्रैटेजिक रीसेट कहना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा से ज्यादा एक टैक्टिकल थॉ है, यानी कारोबारी और रणनीतिक जरूरतों के चलते तनाव में अस्थायी कमी। मोदी-जिनपिंग-पुतिन की तस्वीर का भी अपना संदेश BRICS समिट में प्रधानमंत्री मोदी, जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक साथ नजर आना सिर्फ एक फोटो-ऑप नहीं होगा। पिछले कुछ समय में अमेरिका की टैरिफ और विदेश नीति का असर भारत, रूस और चीन तीनों पर पड़ा है। ऐसे में तीनों नेताओं का एक मंच पर आना वॉशिंगटन के लिए भी एक संदेश माना जाएगा कि भारत के पास अपनी विदेश नीति में विकल्प मौजूद हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि भारत चीन और रूस के साथ मिलकर अमेरिका विरोधी किसी धड़े में शामिल हो गया है। भारत की विदेश नीति अब भी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देती है। इसलिए तस्वीर जितनी राजनीतिक होगी, उसका संदेश उतना ही कूटनीतिक भी होगा। BRICS में भारत-चीन के रिश्ते क्यों अहम? BRICS के विस्तार के बाद यह संगठन पहले के मुकाबले कहीं बड़ा हो चुका है। इसमें दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ ग्लोबल साउथ के कई महत्वपूर्ण देश शामिल हैं। ऐसे में संगठन को प्रभावी बनाए रखने के लिए भारत और चीन जैसे दो बड़े सदस्यों के बीच लगातार टकराव BRICS की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। खास बात यह है कि अगले साल BRICS की मेजबानी चीन को करनी है। ऐसे में जिनपिंग का भारत आना बीजिंग के लिए भी महत्वपूर्ण है। अगर चीन मौजूदा अध्यक्ष देश भारत के महत्वपूर्ण सम्मेलन से दूरी बनाता, तो इसका राजनीतिक संदेश अलग जाता। लेकिन सबसे बड़ी दीवार है भरोसे की कमी भारत और चीन के रिश्तों में सबसे बड़ी समस्या सीमा विवाद है। 1962 के युद्ध से लेकर देपसांग, चुमार, डोकलाम और गलवान तक दोनों देशों के बीच तनाव की लंबी कहानी रही है। गलवान के बाद पैदा हुआ अविश्वास अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। ऐसे में सिर्फ नेताओं की मुलाकात या हाथ मिलाने से दोनों देशों के बीच भरोसा वापस नहीं आ सकता। यही वजह है कि सीमा पर बातचीत, सैन्य हॉटलाइन, सैनिकों की तैनाती और विवादित इलाकों में स्थिति जैसे मुद्दे आने वाले समय में भी रिश्तों की दिशा तय करेंगे। दूसरा पेंच-चीन के साथ 100 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार घाटा भारत-चीन रिश्तों में दूसरा बड़ा सवाल कारोबार का है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच करीब 151 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। इसमें भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर का सामान खरीदा, जबकि चीन को करीब 19 अरब डॉलर का निर्यात किया। यानी भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर रहा। यह अंतर सिर्फ आंकड़ा नहीं है। भारत की कई रणनीतिक इंडस्ट्रीज चीन से आने वाले कंपोनेंट्स और मशीनरी पर निर्भर हैं। इसलिए भारत के लिए चीन के साथ कारोबार बढ़ाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करना भी है। जिनपिंग की यात्रा से क्या हासिल हो सकता है? जिनपिंग की यात्रा से सबसे ज्यादा उम्मीद कारोबार, निवेश, वीजा और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में किसी फ्रेमवर्क को लेकर है। दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी बातचीत को आगे बढ़ाने और सैन्य स्तर पर संपर्क मजबूत करने पर भी चर्चा हो सकती है। लेकिन सीमा विवाद पर किसी बड़े और अंतिम समाधान की उम्मीद फिलहाल कम है। दोनों देशों के बीच अविश्वास, पाकिस्तान का फैक्टर और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे इतने गहरे हैं कि एक बैठक से उनका समाधान संभव नहीं। यानी भारत-चीन रिश्ते में बर्फ पिघल रही है, लेकिन दीवार अभी कायम है। दोनों देश एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश कर सकते हैं, कारोबारी रिश्ते सुधार सकते हैं और सीमा पर तनाव कम कर सकते हैं; लेकिन इसका मतलब फिलहाल यह नहीं कि भारत और चीन एक ही पाले में आ गए हैं। ये भी पढ़ें : BRICS समिट नए भारत की ताकत का प्रतीक! CM योगी बोले- दुनिया में बदली भारत की पहचान