विदेश

रूस से तेल खरीद पर ट्रंप की राहत कितने दिन की? भारत को GTRI की चेतावनी, टैरिफ का खतरा अभी टला नहीं!

रूस से तेल खरीद पर ट्रंप ने भारत को अस्थायी राहत दी है, लेकिन GTRI ने चेताया कि अमेरिकी टैरिफ का खतरा बरकरार है। भारत को ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी।

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

US Tariffs on India: रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी टैरिफ का खतरा फिलहाल कम हुआ है, लेकिन इसे स्थायी राहत मानना जल्दबाजी होगी। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने आगाह किया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फैसला भविष्य में बदल सकता है। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। थिंक टैंक के मुताबिक, अमेरिका की ओर से शुल्क लगाने की धमकी वापस लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भारत को आगे भी ऐसी राहत मिलती रहेगी। अमेरिकी प्रशासन परिस्थितियों के आधार पर दोबारा दबाव बनाने के लिए टैरिफ का सहारा ले सकता है।

क्या है ट्रंप का फैसला

GTRI के अनुसार, ट्रंप ने 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम (SRIA) के तहत कुछ प्रतिबंधों और शुल्क संबंधी कार्रवाई से छूट देने का आदेश जारी किया। इस कदम से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क का खतरा फिलहाल टल गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कानून में रूसी सामान पर 500 प्रतिशत तक शुल्क बढ़ाने और रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान है। यह कार्रवाई 18 अक्टूबर 2026 से नई खरीद के संदर्भ में लागू होने वाली थी।

हालांकि, राहत की कोई निश्चित समाप्ति तिथि घोषित नहीं की गई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रूस से होने वाली ऊर्जा खरीद पर नजर रखेंगे। इसका मतलब है कि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन इस फैसले की समीक्षा कर सकता है।

GTRI ने भारत को क्यों किया सतर्क?

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को इस अस्थायी राहत का इस्तेमाल अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए करना चाहिए। उनके मुताबिक, देश को तेल खरीदने के फैसले बाजार की कीमतों, व्यावसायिक शर्तों और अपनी जरूरतों के आधार पर लेने चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि अमेरिका से मिली अस्थायी राहत के बदले भारत को स्थायी व्यापारिक रियायतें नहीं देनी चाहिए। शुल्क लगाने की धमकी देना और फिर उससे पीछे हटना अमेरिकी व्यापार नीति में अनिश्चितता को दर्शाता है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक ओर कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखे, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी व्यापारिक दबाव के बीच अपने आर्थिक हितों की रक्षा भी करे।

रूस से तेल खरीद में भारत ने कितना बदला रुख?

GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई में 51 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 44 प्रतिशत रह गई। इस अवधि में भारत ने ऊंची कीमतों के बावजूद अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से ज्यादा तेल खरीदा। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत के तेल आयात में स्रोतों का संतुलन बदल रहा है। हालांकि, रूस से खरीद घटने के पीछे अलग-अलग व्यावसायिक और बाजार संबंधी कारण भी हो सकते हैं। ऐसे में केवल इन आंकड़ों के आधार पर किसी एक वजह को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

GTRI का सुझाव है कि भारत को तेल आपूर्ति के कई विकल्प खुले रखने चाहिए, ताकि किसी एक देश की नीतिगत कार्रवाई से घरेलू ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों।

अमेरिका ने टैरिफ से पीछे हटने का फैसला क्यों लिया?

अजय श्रीवास्तव के विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका के इस फैसले के पीछे घरेलू ईंधन जरूरतें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं संभावित कारण हो सकते हैं। उनके अनुसार, 9 अक्टूबर को रूस के साथ हुए समझौते के तहत अमेरिका ने घरेलू कमी और ईंधन की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए रूसी डीजल खरीदने का फैसला किया था। ऐसे में खुद रूसी ऊर्जा खरीदते हुए दूसरे देशों को ऐसा करने पर दंडित करना अमेरिका के लिए दोहरे मानदंडों के आरोपों का कारण बन सकता था।

इसके अलावा, GTRI के मुताबिक, चीन के साथ हुए समझौते के तहत अमेरिका ने 10 जनवरी तक टैरिफ नहीं बढ़ाने पर सहमति जताई थी। ऐसी स्थिति में चीन को राहत देते हुए भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला व्यापार वार्ता को प्रभावित कर सकता था। हालांकि, ये फैसले के पीछे संभावित वजहों को लेकर GTRI का विश्लेषण है, न कि अमेरिकी प्रशासन की ओर से बताई गई आधिकारिक वजहें।

चीन और भारत के मामले में क्या अंतर है?

GTRI का कहना है कि चीन को 10 जनवरी तक अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से सुरक्षा मिली हुई है। अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के अनुसार शुल्क नीति में बदलाव कर सकता है। उनका मानना है कि भारत को अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट रणनीति अपनानी चाहिए और दबाव में आकर जल्दबाजी में फैसले नहीं लेने चाहिए।

आगे भारत के सामने क्या चुनौती होगी?

फिलहाल राहत से भारत को अपनी ऊर्जा नीति की समीक्षा करने का अवसर मिला है, लेकिन भविष्य में अमेरिकी शुल्क नीति किस दिशा में जाएगी, यह स्पष्ट नहीं है। यदि टैरिफ की धमकी दोबारा सामने आती है, तो भारत को तेल की कीमतों, आपूर्ति की उपलब्धता और व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत इस राहत का इस्तेमाल अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में कर पाएगा, या भविष्य में अमेरिकी टैरिफ का दबाव फिर उसकी व्यापार नीति को प्रभावित करेगा?

ये भी पढ़ें: सऊदी अरब जाने वाली एअर इंडिया की उड़ानों पर रोक, 20 अक्टूबर तक रद्द रहेंगी सभी फ्लाइट्स

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Translate »