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डाउन सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं, बल्कि आनुवांशिक स्थिति, समय रहते पहचान से बेहतर जीवन संभव

डाउन सिंड्रोम एक आनुवांशिक स्थिति है, बीमारी नहीं। इसमें बच्चे में 46 की बजाय 47 क्रोमोसोम होते हैं, जिससे चेहरे की बनावट, मांसपेशियों की ताकत और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।

Reported by Ravi and edited by Shagun Chaurasia

Down Syndrome: बच्चों में चेहरे के कुछ विशिष्ट लक्षण, मांसपेशियों में कमजोरी और आंखों का ऊपर की ओर झुकाव डाउन सिंड्रोम की संभावित पहचान हो सकते हैं। चिकित्सकों के अनुसार यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक आनुवांशिक (जेनेटिक) स्थिति है, जिसमें बच्चे के शरीर में सामान्य 46 के स्थान पर 47 क्रोमोसोम पाए जाते हैं। यह अतिरिक्त क्रोमोसोम 21 की एक अतिरिक्त प्रति होने के कारण होता है, जो शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है।

क्या है सिंड्रोम के लक्षण

विशेषज्ञों का कहना है कि डाउन सिंड्रोम के लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं। इनमें मानसिक और शारीरिक विकास में देरी, सीखने और समझने में कठिनाई, मांसपेशियों की कमजोरी तथा कुछ मामलों में हृदय या अन्य जन्मजात स्वास्थ्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं। समय पर पहचान और उचित थेरेपी से प्रभावित बच्चों के विकास में काफी सुधार संभव है।

डॉक्टरों के अनुसार बढ़ती उम्र में गर्भधारण डाउन सिंड्रोम के जोखिम को बढ़ा सकता है, हालांकि इसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता क्योंकि यह स्थिति आनुवांशिक कारणों से उत्पन्न होती है। यह समस्या औसतन हर 700 जन्मों में एक बच्चे में देखी जाती है।

गर्भावस्था में जांच से संभव है पहचान

विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान विभिन्न स्क्रीनिंग और डायग्नोस्टिक टेस्ट से डाउन सिंड्रोम की पहचान की जा सकती है। इनमें फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग, न्यूकल ट्रांसलूसेंसी (NT) अल्ट्रासाउंड, नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट (NIPT), एम्नियोसेंटेसिस और सीवीएस जांच प्रमुख हैं। इन परीक्षणों से माता-पिता को पहले से जानकारी मिल जाती है, जिससे वे समय रहते चिकित्सा परामर्श और देखभाल की योजना बना सकते हैं।

समय पर पहचान और देखभाल

जिम्स के बाल रोग विभाग की विशेषज्ञ डॉक्टर ने बताया कि जागरूकता और बेहतर डायग्नोसिस के चलते अब मामलों की पहचान पहले की तुलना में अधिक हो रही है। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और उचित देखभाल ही बच्चों के बेहतर विकास की कुंजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में जागरूकता बढ़ाकर और शुरुआती उपचार एवं थेरेपी के माध्यम से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों को भी सामान्य और सम्मानजनक जीवन प्रदान किया जा सकता है।

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