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TMC में टूट और NDA की बढ़ती ताकत! क्या बगावत से बदलेगा सत्ता का गणित? समझिए संसद का पूरा नंबर गेम

TMC में बगावत से बदलेगा सत्ता का गणित? NDA की नजर 2/3 बहुमत पर, क्या अब आसान होगा बड़े संवैधानिक बदलावों का रास्ता?

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

TMC Rebel MPs || NDA Numbers || Parliament maths || Mamata Banerjee || TMC News: देश की राजनीति में इन दिनों संख्या बल का गणित सबसे बड़ी चर्चा बना हुआ है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ती असंतुष्टि और सांसदों के संभावित अलग गुट बनाने की खबरों ने संसद के समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यदि TMC के कुछ सांसद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करते हैं तो केंद्र सरकार को उन विधेयकों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जिनके लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

आखिर क्यों अहम है यह संख्या बल?

लोकसभा में किसी सामान्य विधेयक को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होता है। लेकिन संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए विशेष बहुमत की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि सरकार लंबे समय से अपने सहयोगी दलों के साथ-साथ अन्य दलों के सांसदों के समर्थन की संभावनाएं तलाश रही है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी संसद सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। इनमें महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधान और ‘एक देश-एक चुनाव’ जैसे बड़े प्रस्ताव शामिल बताए जा रहे हैं।

लोकसभा में क्या है मौजूदा स्थिति?

लोकसभा की कुल क्षमता 543 सदस्यों की है। हालांकि वर्तमान में कुछ सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी संख्या इससे कम है। मौजूदा समय में NDA के पास करीब 293 सांसदों का समर्थन माना जाता है। यहीं से राजनीतिक गणित दिलचस्प हो जाता है। यदि टीएमसी के बागी सांसदों का एक बड़ा समूह सरकार के पक्ष में आता है तो NDA का आंकड़ा उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय दलों के मुद्दों के आधार पर समर्थन देने की संभावनाओं पर भी राजनीतिक चर्चा जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विभिन्न दलों के सांसद अलग-अलग मुद्दों पर सरकार के साथ खड़े होते हैं, तो NDA संवैधानिक संशोधनों के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की दिशा में काफी आगे बढ़ सकता है।

महिला आरक्षण और एक देश-एक चुनाव क्यों चर्चा में?

केंद्र सरकार लंबे समय से चुनाव सुधारों और महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है। महिला आरक्षण को लागू करने की समयसीमा और एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था जैसे विषयों पर व्यापक राजनीतिक बहस जारी है। इन दोनों प्रस्तावों का सीधा संबंध संविधान में बदलाव से जुड़ा माना जाता है। इसलिए केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति पर्याप्त नहीं होती, बल्कि संसद में आवश्यक संख्या बल भी होना जरूरी होता है।

इसी कारण सरकार की निगाहें उन सांसदों और दलों पर टिकी हुई हैं जो किसी विशेष मुद्दे पर समर्थन देने के लिए तैयार हो सकते हैं।

विपक्षी दलों में बदलाव का असर

हाल के महीनों में कई राज्यों की राजनीति में बदलाव देखने को मिले हैं। चुनावी नतीजों और क्षेत्रीय समीकरणों ने कई दलों की रणनीति को प्रभावित किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ दल अब राष्ट्रीय स्तर पर अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं। यही वजह है कि संसद में पहले जहां सत्ता और विपक्ष के बीच स्पष्ट विभाजन दिखाई देता था, वहीं अब मुद्दों के आधार पर समर्थन और विरोध की राजनीति भी उभर रही है।

यदि यह प्रवृत्ति आगे बढ़ती है तो संसद में मतदान के दौरान परिणाम केवल गठबंधन की औपचारिक सदस्य संख्या से तय नहीं होंगे, बल्कि उपस्थित सांसदों और उनके रुख पर भी निर्भर करेंगे।

निर्दलीय और छोटे दल क्यों बने अहम?

संसदीय राजनीति में कई बार कुछ सांसद पूरे समीकरण को बदल देते हैं। छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों की संख्या भले सीमित हो, लेकिन विशेष बहुमत वाले मामलों में उनका महत्व बढ़ जाता है। सरकार को उम्मीद है कि विकास, क्षेत्रीय हितों और नीति संबंधी मुद्दों पर कुछ सांसद उसका समर्थन कर सकते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक संपर्क और बातचीत का दौर लगातार जारी बताया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि संवैधानिक संशोधन जैसे मामलों में केवल गठबंधन की संख्या ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि मतदान के दिन सदन में मौजूद सांसदों की संख्या भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

राज्यसभा का समीकरण भी उतना ही जरुरी

संविधान संशोधन केवल लोकसभा से पारित होने भर से कानून नहीं बनता। इसके लिए राज्यसभा की मंजूरी भी जरूरी होती है। इसलिए सरकार की रणनीति दोनों सदनों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है। राज्यसभा में NDA पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में माना जा रहा है। कुछ क्षेत्रीय दलों के सहयोग और संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण से सरकार को अतिरिक्त समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि विपक्ष भी पूरी ताकत से सरकार के प्रस्तावों का राजनीतिक और संसदीय स्तर पर मुकाबला करने की तैयारी में है। ऐसे में आने वाले संसद सत्र में दोनों पक्षों के बीच संख्या बल की परीक्षा देखने को मिल सकती है।

आगे क्या?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संभावित राजनीतिक बदलाव वास्तव में संसद के आंकड़ों को प्रभावित करेंगे या यह केवल अटकलें हैं। यदि क्षेत्रीय दलों और बागी सांसदों का समर्थन NDA को मिलता है तो सरकार के लिए बड़े विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान हो सकता है। लेकिन भारतीय राजनीति में अंतिम तस्वीर अक्सर मतदान के समय ही साफ होती है। इसलिए आगामी संसद सत्र केवल विधेयकों के लिए ही नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के नए समीकरणों की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।

आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि क्या NDA वास्तव में दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच पाता है या विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रखने में सफल रहता है। फिलहाल संसद का नंबर गेम देश की राजनीति का सबसे दिलचस्प और निर्णायक अध्याय बन चुका है।

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