कानपुर। गंगा के बढ़ते कटान और लगातार बारिश ने जाजमऊ के ऐतिहासिक टीले पर संकट और गहरा कर दिया है। करीब 2800 साल पुराने बताए जा रहे इस प्राचीन टीले का हिस्सा शनिवार दोपहर अचानक दरक गया, जिसके चलते किनारे बने मकानों का हिस्सा गंगा की ओर खिसककर ढह गया। हादसे में घरेलू सामान भी तेज धारा में बह गया। घटना के बाद आसपास रहने वाले परिवारों में दहशत फैल गई। शनिवार दोपहर करीब तीन बजे हुई इस घटना ने एक बार फिर जाजमऊ टीले की सुरक्षा और इसके किनारे बसे परिवारों के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश के दिनों में टीले का कटाव लगातार बढ़ रहा है और जमीन धीरे-धीरे खिसक रही है। देखते ही देखते गंगा में समा गया स्टोर का हिस्सा स्थानीय निवासियों के मुताबिक, टीले के बिल्कुल किनारे स्थित मुख्तार के मकान का स्टोर अचानक भरभराकर नीचे गिर गया। स्टोर में मकान में रहने वाले किरायेदारों का घरेलू सामान रखा हुआ था। बताया गया कि मकान में करीब पांच किरायेदार रहते हैं। हादसे के दौरान लल्ला और इलियास समेत अन्य लोगों का सामान भी मलबे के साथ गंगा की ओर चला गया। लोगों ने सामान बचाने की कोशिश की, लेकिन तेज कटान और असुरक्षित ढलान के कारण कोई भी नीचे जाने की हिम्मत नहीं कर सका। पीछे की दीवार भी ढही, मकान पर मंडराया संकट टीले के खिसकने का असर मुख्तार के मकान की संरचना पर भी पड़ा। मकान की पीछे की दीवार ढहने के बाद अब बाकी हिस्से की मजबूती को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस तरह से मिट्टी लगातार कट रही है, उससे आसपास बने अन्य मकानों पर भी खतरा बढ़ सकता है। लोगों को डर है कि यदि बारिश और गंगा कटान का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता। पहले भी कई बार दरक चुका है टीला जाजमऊ का यह इलाका पिछले कुछ समय से लगातार कटान की समस्या से जूझ रहा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि बारिश के दौरान टीले के अलग-अलग हिस्सों में पहले भी दरारें और मिट्टी खिसकने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार कटाव बढ़ने के बाद लोग प्रशासन से सुरक्षा की मांग करते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल पाने से उनकी चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। अब शनिवार की घटना के बाद लोगों का कहना है कि केवल अस्थायी उपायों से काम नहीं चलेगा। नोटिस के बावजूद खतरे के बीच रहने को मजबूर परिवार बताया जा रहा है कि प्रशासन की ओर से टीले के आसपास बने कई मकानों को खाली कराने के लिए नोटिस भी दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई परिवार अब भी इलाके में रह रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि मकान खाली करने की चेतावनी देना आसान है, लेकिन परिवारों के सामने रहने और पुनर्वास की बड़ी समस्या है। ऐसे में कई लोग खतरे के बावजूद अपने घर छोड़ने को मजबूर नहीं हो पा रहे हैं। प्राचीन विरासत को बचाने की भी चुनौती जाजमऊ का टीला केवल स्थानीय लोगों के रहने का स्थान नहीं है, बल्कि कानपुर की ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहचान से भी जुड़ा है। करीब 2800 साल पुराने इस क्षेत्र का इतिहास प्राचीन सभ्यता और राजा ययाति से जुड़े संदर्भों में बताया जाता रहा है। ऐसे में टीले का कटाव सिर्फ मकानों के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की चुनौती भी बन गया है। विशेषज्ञों और प्रशासन के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है, एक ओर यहां रह रहे परिवारों की सुरक्षा और दूसरी ओर इस प्राचीन स्थल को कटान से बचाना। वैज्ञानिक जांच का इंतजार, लेकिन खतरा लगातार बढ़ रहा टीले की स्थिति का वैज्ञानिक तरीके से आकलन करने के लिए एचआरआई और सैटेलाइट आधारित जांच की प्रक्रिया प्रस्तावित बताई जा रही है। हालांकि जांच पूरी होने से पहले ही कटान की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वैज्ञानिक रिपोर्ट आने तक टीले के आसपास रहने वाले परिवारों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा? क्या प्रशासन कटान रोकने के लिए तत्काल कोई ठोस कदम उठाएगा या फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाएगा? फिलहाल जाजमऊ में शनिवार को हुआ ताजा भू-स्खलन एक चेतावनी की तरह है। 2800 साल पुरानी विरासत धीरे-धीरे दरक रही है और उसके साथ किनारे बसे लोगों की जिंदगी भी असुरक्षा के साये में गुजर रही है। ये भी पढ़ें : एनटीए यूजीसी नेट जून 2026 का परिणाम घोषित हो चुका है।