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न नाम, न चेहरा… फिर किसके इशारे पर भड़की LPU में हिंसा? 24 घंटे के बवाल में करोड़ो का नुकसान

एलपीयू में सोशल मीडिया पर वायरल दावों से शुरू हुआ छात्र आक्रोश हिंसा तक पहुंचा। हैरानी यह रही कि हजारों छात्रों के बीच आंदोलन की अगुवाई करने वाला कोई चेहरा नहीं था।

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

Punjab LPU Violence: पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) में एक मोबाइल संदेश से शुरू हुआ विवाद कुछ ही घंटों में बड़े छात्र आक्रोश में बदल गया। सोशल मीडिया पर एक छात्रा से जुड़ी कथित घटना को लेकर अलग-अलग दावे तेजी से वायरल हुए। किसी संदेश में दुष्कर्म, कहीं सामूहिक दुष्कर्म और कहीं आत्महत्या जैसी बातें कही गईं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी, लेकिन देखते ही देखते विश्वविद्यालय के छात्रावासों तक बेचैनी पहुंच गई।

रात में सड़क पर उतरे छात्र

रात बढ़ने के साथ बड़ी संख्या में छात्र परिसर से बाहर निकलने लगे। करीब दो बजे जालंधर-फगवाड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी इसका असर दिखाई दिया और यातायात बाधित हो गया। पुलिस मौके पर पहुंची और छात्रों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर चल रही सूचनाओं ने छात्रों के बीच गुस्सा बढ़ा दिया था।

एक घटना कई दावे और बढ़ता तनाव

पुलिस के मुताबिक शुरुआती दौर में उसे कथित घटना को लेकर कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावों ने स्थिति को उलझा दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी वायरल सूचनाओं को गलत और भ्रामक बताते हुए छात्रों से आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की। लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सूचनाएं जिस तेजी से फैल रही थीं, उनके सामने आधिकारिक स्पष्टीकरण का असर सीमित दिखाई दिया। छात्रावासों में एक-दूसरे से मिल रही जानकारी और मोबाइल फोन पर वायरल हो रहे संदेशों ने आशंकाओं को और बढ़ा दिया। रात करीब पौने दो बजे पुलिस को विश्वविद्यालय परिसर में बड़ी संख्या में छात्रों के जुटने की सूचना मिली। पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रित करने और छात्रों से बातचीत करने की कोशिश की। इसी दौरान आंदोलन का असर मुख्य गेट से निकलकर हाईवे तक पहुंच गया।

सुबह दर्ज हुई FIR

स्थिति गंभीर होने के बाद पुलिस ने छात्रों के बयानों के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दुष्कर्म के आरोप में एफआईआर दर्ज की। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल भी गठित किया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच प्रक्रिया में छात्रों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही। उम्मीद थी कि कार्रवाई के बाद तनाव कम होगा, लेकिन परिसर का माहौल तुरंत सामान्य नहीं हुआ। इसके बाद विश्वविद्यालय में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। कुछ वाहनों को भी नुकसान पहुंचाया गया। इन घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होने लगे और विवाद का दायरा और बढ़ गया।

सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ भीड़ को नियंत्रित करना नहीं थी। असली परेशानी यह थी कि हजारों छात्रों के बीच बातचीत के लिए कोई एक प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। न कोई स्पष्ट छात्र नेता सामने आया, न कोई संगठन आंदोलन की अगुवाई करता दिखाई दिया और न ही ऐसा कोई मंच था जहां पुलिस छात्रों की सामूहिक शिकायत सुन सके। अलग-अलग छात्रावासों से छात्र अपने स्तर पर जुड़ते गए। यही वजह थी कि पुलिस के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि भीड़ की वास्तविक मांग क्या है और किस व्यक्ति के जरिए बातचीत आगे बढ़ाई जाए। परंपरागत छात्र आंदोलनों में पुलिस आमतौर पर छात्र संगठनों या उनके पदाधिकारियों से बातचीत करती है। संगठन के नेता मांगों को सामने रखते हैं और फिर अपने समर्थकों से स्थिति शांत करने की अपील करते हैं। एलपीयू में ऐसा कोई स्पष्ट नेतृत्व सामने नहीं आया।

सोशल मीडिया बना आंदोलन का दूसरा मैदान

जिस सोशल मीडिया पर कथित घटना से जुड़े संदेश फैलने शुरू हुए थे, वही बाद में प्रदर्शन, तोड़फोड़ और आगजनी के वीडियो का माध्यम भी बन गया। हर नए वीडियो के साथ छात्रों के बीच नई चर्चा शुरू हो रही थी। कोई दावा कर रहा था, तो कोई उसका अलग अर्थ निकाल रहा था। इस तेजी से बदलते डिजिटल माहौल में पुलिस और प्रशासन के लिए आधिकारिक जानकारी को छात्रों तक पहुंचाना और उनकी शंकाओं का जवाब देना और कठिन हो गया।स्थिति इसलिए भी अलग थी क्योंकि भीड़ किसी एक संगठन के आह्वान पर नहीं जुटी थी। उसके पास कोई औपचारिक कमान नहीं थी। ऐसे में किसी एक व्यक्ति से बातचीत करके पूरी भीड़ को नियंत्रित करना संभव नहीं था।

हजारों छात्रों के बीच पुलिस की चुनौती

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में करीब 35 हजार छात्र पढ़ते हैं और बड़ी संख्या में विद्यार्थी परिसर के छात्रावासों में रहते हैं। ऐसे में किसी एक छात्रावास में शुरू हुई चर्चा कुछ ही समय में दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकती है। घटनाक्रम बढ़ने के बाद डीआईजी नवीन सिंगला ने मौके पर मोर्चा संभाला। कई जिलों से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और अतिरिक्त बल बुलाया गया। पुलिस ने एक तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्ती की, तो दूसरी तरफ छात्रों को समझाने और स्थिति शांत करने की कोशिश जारी रखी। लेकिन स्थिति लगातार बदलती रही। एक जगह हालात संभलते नजर आते तो दूसरी तरफ से तनाव की सूचना आने लगती। यही कारण रहा कि रविवार शाम तक विश्वविद्यालय का माहौल पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया था।

24 घंटे में बदल गई तस्वीर

एलपीयू का यह घटनाक्रम केवल एक छात्र प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। शुरुआत एक मोबाइल संदेश से हुई, फिर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे सामने आए, छात्रावासों में बेचैनी बढ़ी, छात्र सड़कों पर पहुंचे और इसके बाद मामला तोड़फोड़ व आगजनी तक जा पहुंचा। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम पहलू यह रहा कि हजारों छात्रों के आक्रोश का कोई एक चेहरा नहीं था। पुलिस के सामने भीड़ थी, लेकिन उसका कोई औपचारिक नेता नहीं था। प्रशासन के पास जवाब देने के लिए संस्थागत तंत्र था, लेकिन छात्रों की ओर से सवाल रखने वाला कोई एक प्रतिनिधि नहीं था। यही बेनाम और विकेंद्रित आक्रोश पुलिस-प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया।

जांच के सामने बड़े सवाल

अब इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों के सामने दो समानांतर सवाल हैं की वायरल दावों की वास्तविकता क्या थी और आखिर किस वजह से एक कथित घटना से जुड़ी सूचना इतनी तेजी से फैलकर बड़े पैमाने के विरोध में बदल गई? एलपीयू में 24 घंटे तक जो कुछ हुआ, उसने यह जरूर दिखा दिया कि सोशल मीडिया के दौर में बिना स्पष्ट नेतृत्व वाला छात्र आक्रोश कितनी तेजी से आकार ले सकता है और प्रशासन के सामने संवाद की सबसे बड़ी चुनौती यही हो सकती है कि आखिर बात की जाए तो किससे?

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