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आसमान के पायलट से आधुनिक भारत के शिल्पकार तक, राजीव गांधी की वो अनसुनी कहानी

कॉकपिट से पीएमओ तक का सफर, विपक्ष का भारी विरोध और कंप्यूटर युग की शुरुआत—पढ़िए भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कुछ अनसुने पहलू।

Reported by Kashish Solanki and edited by Shagun Chaurasia

RAJIV GANDHI|| PRIME MINISTER|| INDIAN NATIONAL CONGRESS: आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि है। वे इस देश के सातवें प्रधानमंत्री थे और भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र के पीएम रहे। उनका निधन 21 मई 1991 को प्रतिबंधित लिट्टे के आतंकियों द्वारा हुआ था।राजीव गांधी की राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन हालात ऐसे बने कि उन्हें राजनीति में कदम रखना पड़ा और उन्होंने देश के सबसे युवा पीएम के रूप में अपनी पहचान बनाई।

राजनीती में नहीं थी ज्यादा रुचि

राजीव गांधी को राजनीति की विरासत मिली थी, लेकिन वे इसमें ज्यादा रुचि नहीं रखते थे। भारत सरकार के आधिकारिक PMO (प्रधान मंत्री कार्यालय) पोर्टल पर उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, राजीव गांधी को असल में फोटोग्राफी, रेडियो सुनना और विमान उड़ाना पसंद था। उन्होंने ब्रिटेन से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, फिर दिल्ली फ्लाइंग क्लब से कमर्शियल पायलट का लाइसेंस लिया और 1970 में ‘इंडियन एयरलाइंस’ में पायलट के तौर पर काम करने लगे। दिल्ली-जयपुर-आगरा रूट पर अक्सर फ्लाइट्स होती थीं। लेकिन 23 जून 1980 को एक विमान हादसे में उनके छोटे भाई संजय गांधी की अचानक मौत हो गई।

संजय के जाने के बाद, मां इंदिरा गांधी को राजनीतिक मदद देने के लिए राजीव पर काफी दबाव था। शुरू में वह इसके खिलाफ थे (यहां तक कि सोनिया गांधी भी उनकी राजनीति में आने के फैसले के खिलाफ थीं), लेकिन अंततः मां की सहायता के लिए उन्होंने मन की भारीता के साथ नौकरी छोड़ दी, राजनीति में कदम रखा और अमेठी से चुनाव जीत लिया।

40 की उम्र में संभाली सत्ता

31 अक्टूबर 1984 को, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने हत्या कर दी, देश एक बेहद मुश्किल समय में था। इसी कठिन माहौल के बीच, राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शोक की अवधि खत्म होते ही उन्होंने देश में आम चुनाव कराए। इस चुनाव में जनता ने उन पर इतना भरोसा दिखाया कि कांग्रेस ने 541 में से 414 सीटें जीतकर इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल की। सिर्फ 40 साल की उम्र में, वे भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। अपनी साफ-सुथरी छवि के चलते, शुरुआती दिनों में मीडिया ने उन्हें ‘मिस्टर क्लीन’ का नाम दिया था।

राजीव गांधी के वो 3 फैसले

राजीव गांधी का दृष्टिकोण पूरी तरह आधुनिक और तकनीकी था। वे अक्सर कहते थे कि उनका मकसद भारत को 21वीं सदी में ले जाना है। उनके तीन फैसलों ने भारत के इतिहास को पूरी तरह बदल दिया:

डिजिटल इंडिया और दूरसंचार क्रांति (Telecom Revolution)

आज जिस डिजिटल इंडिया की बात की जा रही है और हम सब अपने हाथों में स्मार्टफोन लेकर घूम रहे हैं, उसकी नींव राजीव गांधी ने रखी थी। उन्हें भारत में कंप्यूटर और दूरसंचार क्रांति का जनक कहा जाता है। अगस्त 1984 में उन्होंने ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स’ (C-DOT) की स्थापना की, जिससे भारतीय टेलीकोम नेटवर्क को स्वदेशी तकनीक से मजबूत किया जा सके। 1986 में, उन्होंने ‘एमटीएनएल’ (MTNL) और ‘वीएसएनएल’ (VSNL) की शुरुआत की, जिसके चलते शहरों से गांवों तक पीसीओ (PCO) का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हुआ। उस समय जब विपक्ष कंप्यूटर को ‘नौकरियां छीनने वाली मशीन’ कहकर विरोध कर रहा था, राजीव गांधी ने कंप्यूटर उपकरणों पर आयात शुल्क घटाया और सरकारी दफ्तरों में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया।

वोट देने की उम्र 21 से घटाकर 18 साल 

राजीव गांधी को युवाओं की ताकत और समझ पर बहुत विश्वास था। उनका मानना था कि अगर कोई 18 साल का युवा देश की सरकार चुनने के लिए परिपक्व है, तो उसे वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे पहले भारत में वोट डालने की कानूनी उम्र 21 वर्ष थी।राजीव गांधी सरकार ने संसद में 61वां संविधान संशोधन अधिनियम (1988) मंजूर कराया।इसके तहत वोटिंग की उम्र को 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, जो मार्च 1989 से पूरे देश में लागू हुआ। इस महत्वपूर्ण फैसले ने देश की राजनीति में लगभग 5 करोड़ नए युवा मतदाताओं को जोड़ा, और इसने भारतीय लोकतंत्र का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया।

नवोदय विद्यालयों की शुरुआत और नई शिक्षा नीति

राजीव गांधी ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक बेहतरीन योजना बनाई कि गांवों के गरीब और प्रतिभाशाली बच्चों को भी बड़े शहरों के महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की तरह की शानदार शिक्षा मुफ्त में मिल सके। 1986 में उनकी सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नैशनल पॉलिसी ऑन एजुकेशन (एनपीई) पेश की। इसी नीति के तहत देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में जवाहर नवोदय विद्यालयों (Navodaya Vidyalayas) की स्थापना की गई। ये स्कूल पूरी तरह से आवासीय (रेसिडेंशियल) और सह शैक्षिक थे, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों के होशियार बच्चों को प्रवेश परीक्षा के जरिए चुना जाता था। उन्हें कक्षा 6 से 12वीं तक मुफ्त शिक्षा, हॉस्टल, कपड़े और भोजन दिया जाता था। आज भी ये स्कूल देश के सबसे सफल और अच्छे नतीजे देने वाले सरकारी स्कूलों में शामिल हैं।

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