UP Nishad Community: उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय की नाराजगी अब बीजेपी के लिए चिंता का कारण बनती दिख रही है। आरक्षण की लंबे समय से चली आ रही मांग के बीच गोंडा में निषाद पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता और व्यापारी विनोद कुमार साहनी की मौत ने मामला और संवेदनशील बना दिया है। बुधवार रात हमले में घायल विनोद को गंभीर हालत में लखनऊ के KGMU लाया गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। दो अफसर निलंबित घटना के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद KGMU पहुंचे और धरने पर बैठ गए। उन्होंने आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की। पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे हैं और मामले में दो पुलिस अधिकारियों के निलंबन की बात सामने आई है। पुलिस की शुरुआती जांच में सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद की बात भी कही गई है। BJP के लिए क्यों अहम है निषाद वोट? निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समुदायों की मजबूत मौजूदगी पूर्वी यूपी के कई हिस्सों में है। गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर, देवरिया, कुशीनगर, अयोध्या, मिर्जापुर, भदोही, प्रयागराज और गंगा-घाघरा क्षेत्र की कई सीटों पर इनका वोट चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकता है। इसी राजनीतिक महत्व को देखते हुए बीजेपी ने निषाद पार्टी के साथ गठबंधन किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी के छह विधायक जीते थे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी का समीकरण बदला और बीजेपी को बड़ा झटका लगा। ऐसे में 2027 से पहले सहयोगी दलों और पिछड़े वर्गों के समर्थन को मजबूत रखना बीजेपी के लिए अहम है। नाराजगी की जड़ में आरक्षण निषाद समुदाय लंबे समय से निषाद, केवट, मल्लाह और संबंधित जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग करता रहा है। हाल में कासगंज के पटियाली में भी समाज की ओर से प्रशासन को ज्ञापन देकर आरक्षण की मांग दोहराई गई। क्या चुनाव तक बढ़ेगा असर? गोंडा की घटना के बाद मामला जातीय तनाव के एंगल से भी चर्चा में है। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों की जाति ठाकुर बताई जा रही है, जिससे समुदाय में भेदभाव और सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि निषाद पूरी तरह बीजेपी से दूर हो रहे हैं। लेकिन 2027 से पहले अगर आरक्षण, सुरक्षा और गोंडा कांड जैसे मुद्दे एक साथ राजनीतिक नाराजगी में बदलते हैं, तो कुछ सीटों पर मामूली वोट स्विंग भी बीजेपी के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकता है। यही वजह है कि निषादों की नाराजगी को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। ये भी पढ़ें: 5 डे वर्किंग पर फिर घमासान, गाजियाबाद में बैंक कर्मचारियों का प्रदर्शन, सितंबर में बड़े आंदोलन की चेतावनी