भारतविदेश

बढ़े सदस्य तो बढ़ी मुश्किलें… BRICS में सहमति का गहराया संकट!

दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन से पहले बड़ा सवाल क्या भारत सभी सदस्य देशों को साझा बयान पर राजी कर पाएगा? ईरान और अमेरिका फैक्टर बढ़ा रहे चुनौती।

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

BRICS Summit: नई दिल्ली में शनिवार को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। वैश्विक व्यापार में बढ़ती रुकावटों, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता और समुद्री मार्गों पर संकट के बीच हो रही यह बैठक भारत के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। लेकिन सम्मेलन से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई दिल्ली BRICS के सभी सदस्यों को एक साझा रुख पर ला पाएगी?

साझा बयान पर संकट

दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, सम्मेलन की सफलता का बड़ा पैमाना एक संयुक्त घोषणापत्र जारी होना होगा। उनका कहना है कि BRICS के विस्तार के साथ सदस्य देशों के हित भी पहले से ज्यादा अलग हुए हैं। ऐसे में किसी एक मुद्दे पर सहमति बनाना लगातार कठिन होता जा रहा है। यही वजह है कि भविष्य में संगठन के प्रभावी बने रहने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

ईरान और अमेरिका फैक्टर सबसे बड़ी चुनौती

भारत के सामने सम्मेलन में दो बड़ी कूटनीतिक चुनौतियां हैं। पहली चुनौती ईरान को लेकर है। मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के बीच BRICS में ईरान और UAE जैसे देश शामिल हैं, जिनके हित कई मुद्दों पर अलग हो सकते हैं। दूसरी और बड़ी चुनौती अमेरिका से जुड़े रुख की है। रूस, ईरान और चीन जैसे सदस्य अमेरिका की आलोचना वाला कड़ा बयान चाहते हैं तो भारत समेत कुछ देश ऐसा करने से बचना चाहेंगे। खासकर भारत के लिए अमेरिका के साथ आर्थिक और व्यापारिक संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक मौका

कुगेलमैन के अनुसार, मौजूदा वैश्विक अस्थिरता BRICS के लिए चुनौती के साथ-साथ अवसर भी है। विकासशील देश मौजूदा वैश्विक आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाश रहे हैं। ऐसे समय में भारत के पास ग्लोबल साउथ के साथ अपनी भागीदारी मजबूत करने और वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को सामने रखने का मौका है। हालांकि, जैसे-जैसे BRICS का विस्तार हुआ है, संगठन के भीतर एकराय बनाना मुश्किल हुआ है। इसलिए दिल्ली सम्मेलन में सिर्फ बड़े ऐलान नहीं, बल्कि सभी देशों को साथ लेकर चलने की क्षमता भी भारत की परीक्षा होगी।

कैसे बना BRICS?

BRICS नाम की शुरुआत 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील के ‘BRIC’ शब्द से हुई थी। इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। 2009 में इन देशों ने औपचारिक रूप से साथ काम करना शुरू किया। 2011 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद BRIC का नाम BRICS हुआ। 2024 में ईरान, मिस्र, इथियोपिया और UAE के शामिल होने से संगठन का विस्तार हुआ। 2025 में इंडोनेशिया भी सदस्य बना। सऊदी अरब को भी सदस्य बनने का निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उसने अभी तक औपचारिक स्वीकृति नहीं दी है।

समिट से पहले PM मोदी का संदेश

सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS बिजनेस फोरम में वैश्विक व्यापार के लिए सुरक्षित समुद्री मार्गों और मजबूत सप्लाई चेन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अपनी सप्लाई चेन को मजबूत और विविध बना रहा है। अब असली नजर इस बात पर है कि दिल्ली में BRICS के बढ़ते प्रभाव को एकजुट राजनीतिक और आर्थिक संदेश में बदला जा सकेगा या अलग-अलग हितों के चलते साझा बयान ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा।

ये भी पढ़ें: क्या है BRICS जिसके लिए सज रही दिल्ली? 4 देशों से शुरू हुआ सफर अब 11 तक पहुंचा, जानिए भारत के लिए क्यों अहम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Translate »