उत्तर प्रदेशबाँदा

रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के खिलाफ फूटा जनाक्रोश, कई संगठनों का कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन

बाँदा के रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में भ्रष्टाचार, डॉक्टरों की अनुपस्थिति, स्टाफ की कमी और मरीजों से वसूली के आरोपों को लेकर सामाजिक संगठनों व अधिवक्ताओं ने प्रदर्शन किया।

Banda Medical College: उत्तर प्रदेश के बाँदा स्थित राजकीय रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज इन दिनों चिकित्सा सेवा का केंद्र कम और प्रशासनिक अनियमितताओं व भ्रष्टाचार का अड्डा अधिक बन चुका है। आलम यह है कि अस्पताल की मुख्य व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं और मरीज भगवान भरोसे इलाज कराने को मजबूर हैं। मेडिकल कॉलेज में व्याप्त कथित अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के विरोध में कई सामाजिक संगठन और अधिवक्ता कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन कर रहे हैं।

फार्मेसी में आधा स्टाफ गायब

मेडिकल कॉलेज के ईएनटी (नाक, कान, गला) के HOD जितेंद्र यादव और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष (HOD) कुलदीप लंबे समय से अपनी ड्यूटी से नदारद रहते हैं। यही हाल मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी का भी है, जहां तैनात आधा स्थायी स्टाफ कभी ड्यूटी पर पहुंचता ही नहीं।

बिना साइन के बांटी जा रही हैं जांच रिपोर्ट

मेडिकल कॉलेज में होने वाली पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जांचों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मरीजों को दी जाने वाली जांच रिपोर्टों पर स्थायी लैब टेक्नीशियन (LT) के हस्ताक्षर तक नहीं होते। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब स्थायी तकनीकी स्टाफ अस्पताल आ ही नहीं रहा है, तो मरीजों की गंभीर जांचें आखिर किसके भरोसे की जा रही हैं?

ऑपरेशन के नाम पर लूट

सरकार द्वारा मुफ्त इलाज और दवाओं के दावों के बीच, यहां सर्जरी कराने आने वाले मरीजों से ऑपरेशन से पहले ही 25 से 30 हजार रुपये तक की दवाइयां और चिकित्सा सामान बाहर से मंगवाया जाता है। गरीब मरीज मजबूरी में कर्ज लेकर बाहर के मेडिकल स्टोरों से सामान खरीदने को विवश हैं।

11 साल से एक ही डॉक्टर का कब्जा

स्थानांतरण नीति की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए डॉक्टर मुकेश बंसल पिछले 11 सालों से इसी मेडिकल कॉलेज में जमे हुए हैं, जबकि सरकारी नीति के तहत किसी भी अधिकारी की तैनाती 3 से अधिकतम 5 वर्ष ही हो सकती है। इतना ही नहीं, आउटसोर्सिंग, सुरक्षा (सिक्योरिटी) और सफाई व्यवस्था जैसे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण व बजट-आवंटित प्रभार भी इन्हीं के पास हैं।

प्रिंसिपल के भरोसे कॉलेज

अस्पताल के मुख्य प्रशासनिक पद पर भी अनिश्चितता बनी हुई है। कार्यवाहक/प्रभारी प्रिंसिपल के रूप में तैनात डॉ. सुनील कौशल भी पिछले साढ़े तीन सालों से कुर्सी पर बने हुए हैं। अस्पताल में व्याप्त इस संगठित भ्रष्टाचार और मनमानी के कारण दूर-दराज से आने वाले मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे प्रदेश सरकार की जन कल्याणकारी नीतियों और छवि को भी गहरा धक्का लग रहा है। स्थानीय प्रशासन और शासन स्तर पर अब तक इस मामले में कोई सख्त कदम न उठाए जाने से कॉलेज प्रशासन के हौसले बुलंद हैं।

रिपोर्ट – अभिषेक शुक्ला

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