अयोध्याउत्तर प्रदेश

3 शिकायतें दर्ज पर नहीं हुई FIR… दानपात्र से दस्तावेज तक, राम मंदिर केस में SIT की बड़ी पड़ताल

राम मंदिर दान विवाद में SIT ने ट्रस्ट पदाधिकारियों समेत 40 कर्मचारियों से पूछताछ की। तीन शिकायतों के बावजूद अब तक FIR दर्ज नहीं हुई, जिससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

Ram Mandir Donation Controversy: अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान को लेकर उठे सवाल अब एक बड़े जांच अभियान का रूप लेते जा रहे हैं। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) लगातार दूसरे दिन भी सक्रिय रहा। मंदिर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों से लेकर दान राशि की गिनती करने वाले कर्मचारियों तक, कई लोगों से पूछताछ की जा चुकी है। इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी बरकरार है जब तीन अलग-अलग शिकायतें सामने आ चुकी हैं, तो अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई?

ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी रडार पर

सूत्रों के अनुसार, एसआईटी ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और मंदिर प्रशासन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ की है। जांचकर्ताओं ने दान संग्रहण की पूरी प्रक्रिया, उसकी निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी जुटाई। बताया जा रहा है कि जांच दल यह समझने की कोशिश कर रहा है कि दान राशि मंदिर में आने के बाद किस तरह दर्ज की जाती है, उसकी गिनती कैसे होती है और आखिर बैंक तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। अधिकारियों ने संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों की भी बारीकी से समीक्षा की।

CCTV फुटेज और रिकॉर्ड खंगाल रही SIT

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रखी गई है। एसआईटी ने मंदिर परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग भी खंगालनी शुरू कर दी है। जांचकर्ता पिछले कई दिनों के फुटेज का अध्ययन कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि दानपात्रों के संचालन और नकदी प्रबंधन में कहीं कोई संदिग्ध गतिविधि तो नहीं हुई। इसके साथ ही दानपात्रों की संख्या, उनके रखरखाव की व्यवस्था और दान संग्रहण से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां हर उस कड़ी को जोड़ने में जुटी हैं, जिससे पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सके।

आभूषण कक्ष तक पहुंची जांच

जांच का दायरा केवल नकद दान तक सीमित नहीं है। एसआईटी ने उस सुरक्षित कक्ष का भी निरीक्षण किया है, जहां रामलला को चढ़ाए गए सोने-चांदी के आभूषण और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं रखी जाती हैं। जांच अधिकारियों ने वहां की सुरक्षा व्यवस्था, रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया और जिम्मेदार कर्मचारियों की भूमिका को समझने का प्रयास किया। इस दौरान संबंधित कर्मचारियों से भी पूछताछ की गई। अधिकारियों का मकसद यह जानना है कि मूल्यवान दान सामग्री की निगरानी और संरक्षण के लिए कौन-कौन सी व्यवस्थाएं लागू हैं और उनमें कहीं कोई कमी तो नहीं है।

आखिर 40 कर्मचारी जांच के घेरे में क्यों?

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि दान राशि की गिनती और रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया में लगभग 40 कर्मचारी शामिल रहते हैं। इनमें ट्रस्ट, बैंक और संग्रहण एजेंसियों से जुड़े लोग शामिल बताए जा रहे हैं। ये कर्मचारी अलग-अलग शिफ्टों में काम करते हैं और दानपात्रों से निकलने वाली नकदी की गिनती, मिलान और रिकॉर्ड तैयार करने की जिम्मेदारी संभालते हैं। ऐसे में जांच एजेंसियां अब पूरी प्रक्रिया की हर कड़ी की पड़ताल कर रही हैं।

हालांकि फिलहाल किसी भी व्यक्ति को आरोपी नहीं माना गया है और जांच अभी शुरुआती चरण में है। फिर भी अधिकारियों का मानना है कि पूरी प्रक्रिया को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

तीन शिकायतें आईं लेकिन FIR अब तक नहीं

इस विवाद का सबसे चर्चित पहलू यह है कि कई शिकायतें सामने आने के बावजूद पुलिस ने अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की है। अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों ने संबंधित थाने में शिकायतें दी हैं और दान राशि में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। इसके बावजूद मामला अभी तक औपचारिक आपराधिक मुकदमे तक नहीं पहुंचा है। यही वजह है कि विपक्षी दल और कुछ सामाजिक संगठन लगातार सवाल उठा रहे हैं कि यदि आरोप गंभीर हैं, तो एफआईआर दर्ज करने में देरी क्यों हो रही है।

करणी सेना ने भी उठाए सवाल

मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है। विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने जांच की पारदर्शिता और कार्रवाई की गति पर सवाल उठाए हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, जबकि यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि आस्था से जुड़े इतने बड़े संस्थान पर लग रहे आरोपों को लेकर किसी भी तरह की अस्पष्टता नहीं रहनी चाहिए।

राजनीति भी हुई गर्म

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होती जा रही है। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। कुछ नेताओं का कहना है कि चूंकि राम मंदिर देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा विषय है, इसलिए जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। कुछ राजनीतिक नेताओं ने यहां तक सुझाव दिया है कि जांच प्रक्रिया की निगरानी किसी स्वतंत्र एजेंसी या उच्च स्तर की व्यवस्था के माध्यम से कराई जाए, ताकि किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे।

आखिर कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

यह विवाद उस समय चर्चा में आया जब मंदिर में चढ़ावे की राशि को लेकर सवाल उठने लगे। इसके बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई। धीरे-धीरे मामला इतना बढ़ गया कि सरकार को एसआईटी गठित करनी पड़ी। तब से लेकर अब तक जांच एजेंसियां लगातार तथ्य जुटाने और आरोपों की सच्चाई का पता लगाने में लगी हुई हैं।

अब सबकी निगाहें SIT रिपोर्ट पर

फिलहाल इस पूरे मामले में सवाल ज्यादा हैं और जवाब कम। क्या वास्तव में दान राशि में कोई अनियमितता हुई? क्या जांच में किसी की भूमिका सामने आएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या शिकायतों के आधार पर आगे एफआईआर दर्ज होगी? इन सभी सवालों का जवाब अब एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद है। चूंकि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए इस जांच के निष्कर्ष पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह रिपोर्ट तय करेगी कि यह मामला केवल आरोपों तक सीमित रहता है या फिर किसी बड़े खुलासे की ओर बढ़ता है।

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