Modi Govt Challenge Social Media: डिजिटल दौर में सोशल मीडिया केवल राय रखने का मंच नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक दबाव बनाने का प्रभावी माध्यम भी बनता जा रहा है। हाल के छात्र आंदोलनों के बाद अब दो नए ऑनलाइन अभियान 'E10 लाओ' और 'आरक्षण हटाओ' तेजी से चर्चा में हैं। ये दोनों मुद्दे अलग-अलग वर्गों से जुड़े हैं, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इनका प्रभाव व्यापक माना जा रहा है। E20 पेट्रोल पर क्यों उठ रहे सवाल? सरकार द्वारा पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) को बढ़ावा देने की नीति का सोशल मीडिया पर विरोध देखने को मिल रहा है। कई वाहन मालिकों का दावा है कि E20 ईंधन से पुराने वाहनों के इंजन, माइलेज और रखरखाव पर असर पड़ सकता है। इसी के चलते 'E10 लाओ', 'Say No to E20' और इसी तरह के कई ऑनलाइन अभियान चलाए जा रहे हैं। इन अभियानों से जुड़े लोगों की प्रमुख मांग है कि पुराने वाहनों के लिए E10 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाए और E20 ईंधन की कीमतों पर भी पुनर्विचार किया जाए। दूसरी ओर, सरकार लगातार यह स्पष्ट कर रही है कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन सुरक्षित है और इससे वाहन प्रदर्शन पर गंभीर असर पड़ने के दावों का वैज्ञानिक आधार नहीं है। 'आरक्षण हटाओ' अभियान भी चर्चा में दूसरी ओर सोशल मीडिया पर 'आरक्षण हटाओ' नाम से भी अभियान चलाया जा रहा है। इसके समर्थक पारंपरिक धरना-प्रदर्शन के बजाय डिजिटल माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की रणनीति अपना रहे हैं। अभियान से जुड़े लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं के पोस्ट पर बड़ी संख्या में अपनी मांगों से जुड़े संदेश लिखने की अपील कर रहे हैं। यह अभियान मुख्य रूप से उन युवाओं के बीच चर्चा में है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में अवसरों को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। वहीं, आरक्षण का मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग सहित कई समुदाय सीधे जुड़े हैं। सरकार के लिए चुनौती क्यों मानी जा रही है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों मुद्दों का संबंध ऐसे वर्गों से है जिनकी चुनावी भूमिका अहम मानी जाती है। एक ओर E20 नीति को लेकर वाहन मालिकों और मध्यम वर्ग की चिंताएं सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर आरक्षण को लेकर अलग-अलग वर्गों में भिन्न राय मौजूद है। सरकार E20 पर लगातार अपनी नीति का बचाव कर रही है, जबकि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सार्वजनिक बयानबाजी से बचती नजर आती है। ऐसे मामलों में किसी भी पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है असर आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इन अभियानों पर राजनीतिक दलों की भी नजर बनी हुई है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने यह दिखाया है कि ऑनलाइन अभियान कम समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं और जनमत को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन डिजिटल अभियानों का वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया अब राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल ऑनलाइन ट्रेंड से निपटने की नहीं, बल्कि लोगों की चिंताओं पर संवाद और भरोसा कायम रखने की भी है। ये भी पढ़ें: जंतर-मंतर के चर्चित आंदोलन की कहानी अब बड़े पर्दे पर! 20 करोड़ में बनेगी फिल्म, टाइटल ने बढ़ाया सस्पेंस