Seema Kaliramana: खेल की दुनिया में वापसी हर खिलाड़ी के लिए चुनौती होती है, लेकिन मां बनने के बाद यह सफर और भी कठिन हो जाता है। जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, शरीर बदलता है और कई बार सपने अधूरे रह जाते हैं। लेकिन भारत की डिस्कस थ्रो एथलीट सीमा कालीरमना ने इन सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिया। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर यह दिखा दिया कि मातृत्व किसी महिला के सपनों की मंजिल नहीं रोक सकता। संघर्ष भरी वापसी हरियाणा की रहने वाली सीमा लंबे समय से डिस्कस थ्रो में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा पदक जीतने का सपना उनके करियर का लक्ष्य था, लेकिन बेटे रुद्र के जन्म के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। प्रेग्नेंसी के दौरान ट्रेनिंग रुकी, फिटनेस प्रभावित हुई और मैदान से दूरी बन गई। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। हौसले की मिसाल बेटे के जन्म के महज 11 महीने बाद सीमा ने फिर से ट्रेनिंग शुरू की। यह वापसी आसान नहीं थी। वह एक ओर छोटे बच्चे की देखभाल कर रही थीं, दूसरी ओर फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी की पढ़ाई भी जारी थी। परिवार, पढ़ाई और खेल तीनों जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने खुद को लगातार तैयार किया। इस पूरे सफर में उनके पति और कोच रविंदर कालीरमना ने उनका पूरा साथ दिया। शानदार कमबैक ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में शुरुआत सीमा के लिए निराशाजनक रही। उनका पहला प्रयास फाउल हो गया। दूसरे प्रयास में उन्होंने 57.32 मीटर का थ्रो किया, जबकि तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर की दूरी तय कर पदक की दौड़ में खुद को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। भारत की बेटी इसके बाद उनके अगले तीनों प्रयास फाउल रहे, जिससे मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया। अब सबकी निगाहें अन्य खिलाड़ियों के अंतिम प्रयासों पर थीं। आखिरी थ्रो के बाद जब कोई भी खिलाड़ी 58.65 मीटर का आंकड़ा पार नहीं कर सकी, तो सीमा के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। भारत की इस बेटी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। महिलाओं के सपनों की जीत सीमा कालीरमना की यह उपलब्धि केवल खेल की जीत नहीं, बल्कि उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो परिवार और जिम्मेदारियों के साथ अपने सपनों को भी जीना चाहती हैं। उनका सफर बताता है कि मजबूत इरादे, मेहनत और परिवार के सहयोग से हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। ये भी पढ़ें: नीली जर्सी की जगह भगवा क्यों? भारतीय हॉकी की नई पहचान पर छिड़ी बहस